Search This Blog

Saturday, October 3, 2020

श्री सूर्य चालीसा

दोहा


कनक बदन कुंडल मकर । 

मुक्ता माला अंग ।

पद्मासन स्थित ध्याइए । 

शंख चक्र के संग ।।


चौपाई


जय सविता जय जयति दिवाकर । 

सहस्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर ।।१।।


भानु, पतंग, मरीची, भास्कर । 

सविता, हंस, सुनूर, विभाकर ।।२।।


विवस्वान, आदित्य, विकर्तन । 

मार्तण्ड, हरिरूप, विरोचन ।।३।।


अम्बरमणि, खग, रवि कहलाते । 

वेद हिरण्यगर्भ कह गाते ।।४।।


सहस्रांशु, प्रद्योतन, कहि कहि । 

मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि ।।५।।


अरुण सदृश सारथी मनोहर । 

हांकत हय साता चढ़‍ि रथ पर ।।६।।


मंडल की महिमा अति न्यारी । 

तेज रूप केरी बलिहारी ।।७।।


उच्चैश्रवा सदृश हय जोते । 

देखि पुरन्दर लज्जित होते ।।८।।


मित्र, मरीचि, भानु । 

अरुण, भास्कर, सविता ।

सूर्य, अर्क, खग । 

कलिहर, पूषा, रवि ।।९।।


आदित्य, नाम लै । 

हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै ।।१०।।


द्वादस नाम प्रेम सो गावैं । 

मस्तक बारह बार नवावै ।।११।।


चार पदारथ सो जन पावै । 

दुख दारिद्र अघ पुंज नसावै ।।१२।।


नमस्कार को चमत्कार यह । 

विधि हरिहर कौ कृपासार यह ।।१३।।


सेवै भानु तुमहिं मन लाई । 

अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई ।।१४।।


बारह नाम उच्चारन करते । 

सहस जनम के पातक टरते ।।१५।।


उपाख्यान जो करते तवजन । 

रिपु सों जमलहते सोतेहि छन ।।१६।।


छन सुत जुत परिवार बढ़तु है । 

प्रबलमोह को फंद कटतु है ।।१७।।


अर्क शीश को रक्षा करते । 

रवि ललाट पर नित्य बिहरते ।।१८।।


सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत । 

कर्ण देश पर दिनकर छाजत ।।१९।।


भानु नासिका वास करहु नित । 

भास्कर करत सदा मुख कौ हित ।।२०।।


ओठ रहैं पर्जन्य हमारे । 

रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे ।।२१।।


कंठ सुवर्ण रेत की शोभा । 

तिग्मतेजसः कांधे लोभा ।।२२।।


पूषा बाहु मित्र पीठहिं पर । 

त्वष्टा-वरुण रहम सुउष्णकर ।।२३।।


युगल हाथ पर रक्षा कारन । 

भानुमान उरसर्मं सुउदरचन  ।।२४।।


बसत नाभि आदित्य मनोहर । 

कटि मंह हंस रहत मन मुदभर ।।२५।।


जंघा गोपति, सविता बासा । 

गुप्त दिवाकर करत हुलासा  ।।२६।।


विवस्वान पद की रखवारी । 

बाहर बसते नित तम हारी ।।२७।।


सहस्रांशु, सर्वांग सम्हारै । 

रक्षा कवच विचित्र विचारे ।।२८।।


अस जोजजन अपने न माहीं । 

भय जग बीज करहुं तेहि नाहीं ।।२९।।


दरिद्र कुष्ट तेहिं कबहुं न व्यापै । 

जोजन याको मन मंह जापै ।।३०।।


अंधकार जग का जो हरता । 

नव प्रकाश से आनन्द भरता ।।३१।।


ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही । 

कोटि बार मैं प्रनवौं ताही ।।३२।।


मन्द सदृश सुतजग में जाके । 

धर्मराज सम अद्भुत बांके ।।३३।।


धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा । 

किया करत सुरमुनि नर सेवा ।।३४।।


भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों । 

दूर हटत सो भव के भ्रम सों ।।३५।।


परम धन्य सो नर तनधारी । 

हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी ।।३६।।


अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन । 

मध वेदांगनाम रवि उदय ।।३७।।


भानु उदय वैसाख गिनावै । 

ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै ।।३८।।


यम भादों आश्विन हिमरेता । 

कातिक होत दिवाकर नेता ।।३९।।


अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं । 

पुरुष नाम रवि हैं मलमासहिं ।।४०।।


दोहा


भानु चालीसा प्रेम युत । 

गावहिं जे नर नित्य ।

सुख सम्पत्ति लहै विविध । 

होंहि सदा कृतकृत्य ।।