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Saturday, October 3, 2020

श्री गायत्री चालीसा

दोहा


ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा जीवन ज्योति प्रचंड ।

शांति कांति जागृत प्रगति रचना शक्ति अखंड ।।

जगत जननी मंगल करनि गायत्री सुखधाम ।

प्रणवों सावित्री स्वधा स्वाहा पूरन काम ।।


चौपाई

भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी ।

गायत्री नित कलिमल दहनी ।।१।।


अक्षर चौबीस परम पुनीता ।

इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता ।।२।।


शाश्वत सतोगुणी सत रूपा ।

सत्य सनातन सुधा अनूपा ।।३।।


हंसारूढ श्वेतांबर धारी ।

स्वर्ण कांति शुचि गगन-बिहारी ।।४।।


पुस्तक पुष्प कमंडलु माला ।

शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला ।।५।।


ध्यान धरत पुलकित हित होई ।

सुख उपजत दुख दुर्मति खोई ।।६।।


कामधेनु तुम सुर तरु छाया ।

निराकार की अद्भुत माया ।।७।।


तुम्हरी शरण गहै जो कोई ।

तरै सकल संकट सों सोई ।।८।।


सरस्वती लक्ष्मी तुम काली ।

दिपै तुम्हारी ज्योति निराली ।।९।।


तुम्हरी महिमा पार न पावैं ।

जो शारद शत मुख गुन गावैं ।।१०।।


चार वेद की मात पुनीता ।

तुम ब्रह्माणी गौरी सीता ।।११।।


महामंत्र जितने जग माहीं ।

कोउ गायत्री सम नाहीं ।।१२।।


सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै ।

आलस पाप अविद्या नासै ।।१३।।


सृष्टि बीज जग जननि भवानी ।

कालरात्रि वरदा कल्याणी ।।१४।।


ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते ।

तुम सों पावें सुरता तेते ।।१५।।


तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे ।

जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे ।।१६।।


महिमा अपरम्पार तुम्हारी ।

जय जय जय त्रिपदा भयहारी ।।१७।।


पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना ।

तुम सम अधिक न जगमें आना ।।१८।।


तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा ।

तुमहिं पाय कछु रहै न क्लेसा ।।१९।।


जानत तुमहिं तुमहिं व्है जाई ।

पारस परसि कुधातु सुहाई ।।२०।।


तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई ।

माता तुम सब ठौर समाई ।।२१।।


ग्रह नक्षत्र ब्रह्मांड घनेरे ।

सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे ।।२२।।


सकल सृष्टि की प्राण विधाता ।

पालक पोषक नाशक त्राता ।।२३।।


मातेश्वरी दया व्रत धारी ।

तुम सन तरे पातकी भारी ।।२४।।


जापर कृपा तुम्हारी होई ।

तापर कृपा करें सब कोई ।।२५।।


मंद बुद्धि ते बुधि बल पावें ।

रोगी रोग रहित हो जावें ।।२६।।


दरिद्र मिटै कटै सब पीरा ।

नाशै दुख हरै भव भीरा ।।२७।।


गृह क्लेश चित चिंता भारी ।

नासै गायत्र भय हारी ।।२८।।


संतति हीन सुसंतति पावें ।

सुख संपति युत मोद मनावें ।।२९।।


भूत पिशाच सबै भय खावें ।

यम के दूत निकट नहिं आवें ।।३०।।


जो सधवा सुमिरें चित लाई ।

अछत सुहाग सदा सुखदाई ।।३१।।


घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी ।

विधवा रहें सत्य व्रत धारी ।।३२।।


जयति जयति जगदंब भवानी ।

तुम सम ओर दयालु न दानी ।।३३।।


जो सतगुरु सो दीक्षा पावे ।

सो साधन को सफल बनावे ।।३४।।


सुमिरन करे सुरूचि बडभागी ।

लहै मनोरथ गृही विरागी ।।३५।।


अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता ।

सब समर्थ गायत्री माता ।।३६।।


ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी ।

आरत अर्थी चिंतित भोगी ।।३७।।


जो जो शरण तुम्हारी आवें ।

सो सो मन वांछित फल पावें ।।३८।।


बल बुधि विद्या शील स्वभाउ ।

धन वैभव यश तेज उछाउ ।।३९।।


सकल बढें उपजें सुख नाना ।

जे यह पाठ करै धरि ध्याना ।।४०।।


दोहा


यह चालीसा भक्ति युत पाठ करै जो कोई ।

तापर कृपा प्रसन्नता गायत्री की होय ।।